Yerwada Charkha of Bhojpur painter Sanjeev Sinha recorded in the world’s greatest record | भोजपुर के चित्रकार संजीव सिन्हा का यरवदा चरखा विश्व के ग्रेटेस्ट रिकॉर्ड में दर्ज

आरा10 घंटे पहले

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बनाया गया यरवदा चरखा

भोजपुर के चित्रकार संजीव सिन्हा ने दुनिया का सबसे बड़ा यरवदा चरखा बना वर्ल्ड रिकॉर्ड इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है। पिछले वर्ष सर्जना न्यास द्वारा आयोजित भोजपुर में गांधी शताब्दी समारोह कार्यक्रम लगभग चार महीने तक चला था। जिसमें बापू से जुड़े तमाम यादों को लोगों के जेहन में फिर से जगाने के लिए पुर्नदृश्य रूपांतरण की प्रस्तुति की गई थी।

इसी आयोजन में ही बापू से जुड़े यरवदा चरखे का विशाल रूप बनाया गया था। जिसपर भोजपुरी लोक चित्रशैली में गांधी जी व आजादी से जुड़े चित्र दर्शाए गए थे। चरखे की लंबाई 24 फीट एवं चौड़ाई 8 फीट थी। इसकी बनावट ऐसी थी कि चरखे को कहीं भी आसानी से खोलकर ले जाया जा सकता है। खोलने पर इसकी ऊंचाई 9 इंच और बंद करने पर 18 इंच है।

संजीव सिन्हा एवं उनके सहयोगी आषिश श्रीवास्तव, मदुरई, श्रील, दीपा, रमन श्रीवास्तव, विष्णु शंकर की 15 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद चरखे को तैयार किया गया। इस चरखे को वर्ल्डज ग्रेटेस्ट रिकॉर्ड ने उन्हें विश्व का सबसे बड़े यरवदा चरखा निर्माण करने का प्रमाण-पत्र जारी किया। यह कीर्तिमान वर्ल्डज ग्रेटेस्ट रिकॉर्ड ने अपने रिकॉर्ड में संचित कर लिया है। सर्जना के अध्यक्ष संजीव सिन्हा ने बताया कि इस यरवदा चरखा निर्माण में सर्जना के संयोजक मनोज दुबे की अहम भूमिका रही है।

चरखा निर्माण में सहयोग करने वालों में मनिषा दिवेदी पाठक, ओवरसीज ऑर्गेनाइजेशन फॉर बेटर बिहार (यूएसए), निदेशक कुमार द्विजेंद्र व प्राचार्या अर्चना सिंह सम्भावना अवासीय विद्यालय, होटल पार्क व्यू क्लार्क इन के जनार्दन सिंह एवं रोहित सिंह, प्रेम पंकज उर्फ ललन थे।

आयोजन को सफल बनाने में न्यास से जुड़े बृजम पाण्डेय एवं यशवंत मिश्रा पटना, शशि रंजन मिश्रा व अमृता दुबे दिल्ली, चंद्रभूषण पाण्डेय, अखौरी राजीव बैगलोर, संजीत सिन्हा रांची, मालती देवी, अखौरी विजय कुमार, ओपी पाण्डेय, संस्कार कृष्णा, दीपेश कुमार, श्याम राजन, विभुती कुमारी, छोटू कुमार और देश भर में सर्जना न्यास जुड़े लोगों की अहम भूमिका रही है।

क्या है बापू का यरवदा चरखा
बापू चरखे के एक अच्छे डिजाइनर भी थे। आजादी के संघर्ष के समय बापू का एक स्थान से दूसरे स्थान आना-जाना लगा रहता था। इस कारण वह अधिकांश सामान अपने साथ चरखा नहीं ले पाते थे। ऐसे में उन्होंने निर्णय लिया कि वह ऐसा चरखा बनाएंगे, जिसे सफर में आसानी से ले जा सके। इसी बीच उन्हें आजादी के संघर्ष के दौरान पूणे की यरवदा जेल जाना पड़ा। यहां उन्होंने फोल्डिंग चरखा बनाया। चूंकि, इसे जेल में डिजाइन किया था, इसलिए इसका नाम भी यरवदा चरखा रखा। इसे एक झोले में रखकर आसानी से कहीं ले जाया जा सकता था।

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