Saurabh And Avinash Are Teaching Hindi To American – अमेरिकन को हिंदी सिखा रहे सौरभ व अविनाश

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झांसी। ये हिंदी ही है, जो विदेशी धरती पर भी अपनों को अपने दामन में समेटे हुए है। ये हिंदी ही है, जो सात समंदर पार भी अपनेपन का अहसास कराती है। ये हिंदी ही है, जिसके मुरीद विदेशी भी होते जा रहे हैं। जी हां, यहां बात झांसी के ऐसे दो युवा प्रोफेशनल की हो रही है, जो सालों से अमेरिका में रह रहे हैं और बेहतर ढंग से अमेरिकन भाषा को पढ़, लिख और समझ लेते हैं, लेकिन अपनत्व का अहसास उन्हें हिंदी बोलकर ही होता है। इतना ही नहीं, अमेरिका में ये लोग हिंदी का कुनबा भी बढ़ा रहे हैं। यहां तक कि इनके संपर्क में आए अमेरिकन भी आसानी से हिंदी बोल और समझ लेते हैं।
रामायण, महाभारत के जरिये बढ़ाया हिंदी का दायरा
झांसी। बड़ाबाजार के रहने वाले सौरभ गुप्ता पिछले 20 साल से अमेरिका के वेस्टपोर्ट में रह रहे हैं। वहां वह आईटी सेक्टर में कार्यरत हैं। उनके दो बेटे हैं, जिनमें से एक का जन्म अमेरिका में ही हुआ। जबकि, दोनों बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा भी वहीं हुई। लिहाजा, दोनों बच्चों की बोलचाल की पहली भाषा अमेरिकन इंग्लिश ही रही। लेकिन, ये विदेशी भाषा घर के भीतर दाखिल नहीं हो पाई। घर में परिवार के सभी सदस्य हिंदी और बुंदेली भाषा में बात करते हैं। ये भाषा उन्हें अपनी धरती से जुड़ाव का अहसास कराती है। बाहर पार्टी या अन्य किसी सार्वजनिक स्थान पर भी परिवार के सभी सदस्य आपस में हर बात हिंदी में ही करते हैं। नियमित रूप से घर के सभी लोग अमर उजाला ई-पेपर पढ़ते हैं। सौरभ ने बताया कि अब उनकी सोसायटी में रहने वाले अमेरिकन भी आसानी से हिंदी बोल और समझ लेते हैं। वे भी उनसे हिंदी में बात करते हैं और खुश होते हैं। उन्होंने बताया कि हिंदी के प्रसार के लिए उन्होंने अमेरिकन को हिंदू धर्म के आराध्य देव राम और कृष्ण से जुड़े रामायण और महाभारत सीरियल देखने के लिए प्रेरित किया। खासतौर पर अमेरिकन बच्चों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। अमेरिकन बच्चे हमारे बच्चों की तरह ही हिंदी में बात करते नजर आते हैं, जिसे सुनकर बेहद सुखद अहसास होता है।
त्योहारों से बढ़ाया हिंदी के प्रति प्रेम
झांसी। पंचकुइयां निवासी अविनाश चतुर्वेदी (अंशू) पिछले पंद्रह सालों से परिवार के साथ अमेरिका में रह रहे हैं। वह वहां एक कंसलटेंसी सर्विस में प्रोग्राम मैनेजर हैं। अविनाश ने बताया कि वह हर त्योहार बेहद धूमधाम से मनाते हैं और इसमें सोसायटी में रहने वाले अमेरिकन परिवारों को शामिल करते हैं। साथ ही अपने ऑफिस के लोगों को भी बुलाते हैं। सब मिलकर होली पर रंग खेलते हैं और दीपावली पर दीप जलाते हैं। इन सभी आयोजन में हिंदी गीत, प्रार्थना, आरती गाई जाती हैं। उनका ये छोटा सा प्रयास बड़ा कारगर साबित हुआ। अमेरिकन भी हिंदी समझने लगे हैं और सामान्य शब्दों का आसानी से उच्चारण भी करते हैं। उनकी दोनों बेटियों की सभी सहेलियां उनसे हिंदी में ही वार्तालाप करती हैं। ऐसा करते हुए देखकर बेहद तसल्ली मिलती है।

झांसी। ये हिंदी ही है, जो विदेशी धरती पर भी अपनों को अपने दामन में समेटे हुए है। ये हिंदी ही है, जो सात समंदर पार भी अपनेपन का अहसास कराती है। ये हिंदी ही है, जिसके मुरीद विदेशी भी होते जा रहे हैं। जी हां, यहां बात झांसी के ऐसे दो युवा प्रोफेशनल की हो रही है, जो सालों से अमेरिका में रह रहे हैं और बेहतर ढंग से अमेरिकन भाषा को पढ़, लिख और समझ लेते हैं, लेकिन अपनत्व का अहसास उन्हें हिंदी बोलकर ही होता है। इतना ही नहीं, अमेरिका में ये लोग हिंदी का कुनबा भी बढ़ा रहे हैं। यहां तक कि इनके संपर्क में आए अमेरिकन भी आसानी से हिंदी बोल और समझ लेते हैं।

रामायण, महाभारत के जरिये बढ़ाया हिंदी का दायरा

झांसी। बड़ाबाजार के रहने वाले सौरभ गुप्ता पिछले 20 साल से अमेरिका के वेस्टपोर्ट में रह रहे हैं। वहां वह आईटी सेक्टर में कार्यरत हैं। उनके दो बेटे हैं, जिनमें से एक का जन्म अमेरिका में ही हुआ। जबकि, दोनों बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा भी वहीं हुई। लिहाजा, दोनों बच्चों की बोलचाल की पहली भाषा अमेरिकन इंग्लिश ही रही। लेकिन, ये विदेशी भाषा घर के भीतर दाखिल नहीं हो पाई। घर में परिवार के सभी सदस्य हिंदी और बुंदेली भाषा में बात करते हैं। ये भाषा उन्हें अपनी धरती से जुड़ाव का अहसास कराती है। बाहर पार्टी या अन्य किसी सार्वजनिक स्थान पर भी परिवार के सभी सदस्य आपस में हर बात हिंदी में ही करते हैं। नियमित रूप से घर के सभी लोग अमर उजाला ई-पेपर पढ़ते हैं। सौरभ ने बताया कि अब उनकी सोसायटी में रहने वाले अमेरिकन भी आसानी से हिंदी बोल और समझ लेते हैं। वे भी उनसे हिंदी में बात करते हैं और खुश होते हैं। उन्होंने बताया कि हिंदी के प्रसार के लिए उन्होंने अमेरिकन को हिंदू धर्म के आराध्य देव राम और कृष्ण से जुड़े रामायण और महाभारत सीरियल देखने के लिए प्रेरित किया। खासतौर पर अमेरिकन बच्चों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। अमेरिकन बच्चे हमारे बच्चों की तरह ही हिंदी में बात करते नजर आते हैं, जिसे सुनकर बेहद सुखद अहसास होता है।

त्योहारों से बढ़ाया हिंदी के प्रति प्रेम

झांसी। पंचकुइयां निवासी अविनाश चतुर्वेदी (अंशू) पिछले पंद्रह सालों से परिवार के साथ अमेरिका में रह रहे हैं। वह वहां एक कंसलटेंसी सर्विस में प्रोग्राम मैनेजर हैं। अविनाश ने बताया कि वह हर त्योहार बेहद धूमधाम से मनाते हैं और इसमें सोसायटी में रहने वाले अमेरिकन परिवारों को शामिल करते हैं। साथ ही अपने ऑफिस के लोगों को भी बुलाते हैं। सब मिलकर होली पर रंग खेलते हैं और दीपावली पर दीप जलाते हैं। इन सभी आयोजन में हिंदी गीत, प्रार्थना, आरती गाई जाती हैं। उनका ये छोटा सा प्रयास बड़ा कारगर साबित हुआ। अमेरिकन भी हिंदी समझने लगे हैं और सामान्य शब्दों का आसानी से उच्चारण भी करते हैं। उनकी दोनों बेटियों की सभी सहेलियां उनसे हिंदी में ही वार्तालाप करती हैं। ऐसा करते हुए देखकर बेहद तसल्ली मिलती है।

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( News Source – Amar Ujala )

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